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हवा कहीं भी चले

हवा कहीं भी चले

जब तक यह नदी बहती रहेगी
मैं नाव चलाती
रहूंगी
कहीं यह नदी किसी मोड़ पे
रुक जाये तो
क्या मैं वापिस आ जाऊं
या उसके साथ वहीं रुक
जाऊं

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प्रतीक्षा करूं
नदी को नया रास्ता मिलने
तक
या चट्टान बन उस
नदी को झील या तालाब
या झरना बन निहारने के
लिये रुक जाऊं
क्या मैं हमेशा के
लिये यहां ठहर जाऊं
इसका साथ दूं
इसकी खुशियों में शामिल रहूं
इसके गमों को गले लगाऊं
झील में तैरती किश्तियों को देखूं
तालाब में उगते कंवलों को
देखूं
या झरनों से गिरते दर्पणों
को देखूं
या देखूं नदी के बदलते रूपों को
इसके नये नये स्वरूपों को
इसका रूप बदला तो
मेरा भी तो बदला न
एक रूप है तो दूसरा
प्रतिरूप
हवा कहीं भी चले
पेड़ के पत्ते से
लेकर घर का कोना
तक भी कहां बचता है।

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